सालों तक भैरोंपुर के हथकरघा बुनकर बड़े ऑर्डर लौटा देते थे, क्योंकि कोई एक परिवार उन्हें समय पर पूरा नहीं कर सकता था। इस त्योहारी मौसम में उन्होंने लगभग हर ऑर्डर के लिए हां कह दी।
यह बदलाव अप्रैल में शुरू हुई एक साझा वर्कशॉप से आया है। इसमें 40 बेहतर करघे, पानी को दोबारा इस्तेमाल करने वाली एक छोटी रंगाई यूनिट और एक डिज़ाइन स्टूडियो है, जहां युवा बुनकर पारंपरिक डिज़ाइनों से कुशन कवर, स्टोल और टेबल रनर बनाना सीखते हैं। इसे 220 बुनकर परिवारों की एक सहकारी समिति चलाती है।
समिति की सचिव शबनम अंसारी ने कहा, "पहले अगर किसी ख़रीदार को 2,000 स्टोल चाहिए होते, तो वह फ़ैक्ट्री के पास जाता था। अब हम ऑर्डर परिवारों में बांटते हैं, वर्कशॉप में फ़िनिशिंग करते हैं और एक ही गुणवत्ता जांच के साथ भेज देते हैं।"
आंकड़ों में
| विवरण | पिछला त्योहारी मौसम | इस बार |
|---|---|---|
| स्वीकार किए गए बड़े ऑर्डर | 9 | 21 |
| प्रति परिवार औसत मासिक कमाई | ₹7,800 | ₹11,500 |
| समिति में 30 साल से कम उम्र के बुनकर | 31 | 58 |
समिति अब दो ऑनलाइन बाज़ारों और राज्य शिल्प मेले के एक स्टॉल के ज़रिए सामान बेचती है। सदस्यों का कहना है कि सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब बुनाई कौन कर रहा है: ज़्यादा युवा, जिनमें बहुत सी महिलाएं हैं, इस हुनर में अपना भविष्य देख रहे हैं।
समिति सर्दियों से पहले रंगे धागे सुखाने के लिए एक सोलर ड्रायर लगाना चाहती है और दस सदस्यों को ऑनलाइन बिक्री के लिए उत्पादों की फ़ोटो खींचने की ट्रेनिंग दिलाना चाहती है।











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