धनपुरा में दो दिन चले पशु चिकित्सा शिविर में आसपास के 30 गांवों से आए करीब 900 ऊंटों की जांच की गई। शिविर का आयोजन ज़िला पशुपालन विभाग और ऊंट पालकों के एक संगठन ने मिलकर किया।
शिविर में ऊंटों का टीकाकरण किया गया, कृमिनाशक दवा दी गई और चमड़ी की बीमारियों का इलाज हुआ। कई पालक अपने ऊंटों के पैरों और दांतों की समस्या लेकर भी पहुंचे।
पशु चिकित्सक डॉ. हेमंत राठौड़ ने बताया, "ऊंट मज़बूत जानवर है, लेकिन बीमारी पकड़ में देर से आती है। साल में दो बार ऐसी जांच से बहुत से नुकसान बच सकते हैं।"
पालकों की चिंता
ऊंट पालकों का कहना है कि खेती में मशीनें आने के बाद ऊंटों की मांग घटी है और चराई की ज़मीन भी कम हुई है। कई परिवार अब सिर्फ़ परंपरा के लिए ऊंट पाल रहे हैं।
- शिविर में ऊंटनी के दूध की बिक्री पर जानकारी दी गई, जिसकी मांग शहरों में बढ़ रही है।
- पालकों को पशु बीमा योजना के फ़ॉर्म भरने में मदद की गई।
- चराई के रास्तों पर पानी की खेलियों की मरम्मत की मांग उठी।
संगठन के मुखिया भीखाराम रेबारी ने कहा, "ऊंट हमारी पहचान है। अगर दूध से कमाई होने लगे, तो युवा भी इस काम में लौटेंगे।" विभाग ने अगला शिविर सर्दियों में पड़ोसी तहसील में लगाने की बात कही है।









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